krishna gyaan

भगवान कृष्ण के उपदेश जो आपके जीवन को देखने का तरीका बदल देंगे !!

  • मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता होती है उसके रहस्य । चाहे आप कितने भी शक्तिशाली क्यों ना हो कितने भी प्रबल क्यों ना हो परन्तु आपके रहस्य आपके नाश की चाबी होते है। इसलिए यदि प्रबल रहना है, शक्तिशाली और समर्थ रहना है तो अपने रहस्य को किसी को भी न बताएं । ना मित्र को और ना ही शत्रु को । चूंकि समय पड़ने पर कब कौन शत्रु हो जाए ऐसा कहना संभव नहीं । विभीषण को रावण के अमृत कुण्ड का ज्ञात था इसीलिये प्रभु श्रीराम रावण का वध करने में सफल हो सकें इसलिए उचित यही है कि आप अपने रहस्य को स्वयं तक ही सीमित रखें ।

 

  • मनुष्य जीवन की परीक्षा में सफल होने के लिए क्या नहीं करता, वह परिश्रम करता है दौड़ भाग करता है और ये सब करने के पश्चात भी जब उसका काम नहीं बनता तो वह नकल करता है । ज़रा लौटिए अपने बचपन में स्मरण कीजिए – विद्यालय में जब आप परीक्षा देने जाते थे । आप ना सही परंतु कोई न कोई सफलता पाने के लिए नकल करता ही था और उत्तीर्ण भी हो जाता था । परंतु जीवन की परीक्षा ऐसे नहीं होती । नकल करने वाला सफल नहीं होता । कारण ? विद्यालय में सबके प्रश्न पत्र एक होते । परंतु जीवन के प्रश्न पत्र और उनकी कठिनाई सबके लिए भिन्न होती है तो निश्चित रूप से उनके उत्तर भी भिन्न होंगे । इसलिए यदि आपको जीवन में सफलता पानी है तो नकल न कीजिए । स्वयं के प्रश्नों का उत्तर स्वयं ढूंढ लें और सफलता आपकी ही होगी ।

 

  • मनुष्य का जीवन हार-जीत ,विजय-पराजय, सफलता और असफलता के मध्य झूलता रहता है । आपके साथ भी ऐसा होता होगा । जब आप सफल होते हैं किसी चुनौती पर विजय पाते हैं तो मन प्रसन्नता से आनंद के उपवन में झूमने लगता है और जब आप असफल होते हैं तब मन दुख और पीड़ा के सागर में डूबने लगता है। परंतु वास्तव में सफलता और असफलता क्या है ? ज़रा ध्यान से सोचें तो यह केवल हमारी मनोस्थिति मात्र है । हमारी पराजय तब नहीं होती जब हमारा शत्रु विजय प्राप्त करता है । हमारी पराजय तब होती है जब हम पराजय स्वीकार करते हैं । हम असफल तब नहीं होते जब हम लक्ष्य न पा सके । हम असफल तब होते हैं जब हम प्रयास करना बंद कर दें इसलिए प्रयास करते रहें और हार न मानें । चूंकि जिस दिन आप हार स्वीकारना बंद कर देंगे जीत आपके चरणों में होगी।

 

  • आप सबने बरगद के वृक्ष को तो देखा ही होगा । क्या आपको ज्ञात है बरगद के वृक्ष के बीज का आकार  राई से भी छोटा होता है । परंतु बरगद का वृक्ष संसार के महाकाय वृक्षों में जाना जाता है । जब उसका जन्म होता है तब उसमें वो जटाएं वो शाखाएं नहीं होती । परन्तु जैसे जैसे उसका विस्तार होता है,  जैसे जैसे वो अधिक शाखाओं का भार उठाता है अधिक पत्तियों का सृजन करता है  वैसे वैसे उसकी शाखाएं जटाएं बनकर जड़ तक पहुँचती हैं और इस वृक्ष को सहारा देती हैं । ये जीवन का बहुत महत्वपूर्ण पाठ है । बिना लोभ लालच शुभकार्य कर अन्य लोगों की सहायता करें, धीरे धीरे आपने जिनकी सहायता की वो आपके सहायक बनते जाएंगे आपकी जड़ों को और बल शाली बनाएंगे । सहायता और निष्काम कर्म आपको मृत्यु के पश्चात् भी मरने नहीं देगा, आपको अमर रखेगा ।

 

  • हमारा शरीर प्रकृति का एक महान अविष्कार है, इससे जटिल संरचना संसार में और कोई नहीं । हमारा शरीर जितना जटिल है यदि इसे ठीक से जाना जाए तो इससे अधिक सरल ज्ञान देने वाला और कोई नहीं । हमारे शरीर में पांच इंद्रियां होती हैं जो हमें भाव, गुण और वस्तुओं का बोध कराती हैं । हमारे पास आँखें , नाक, त्वचा , कान और जिह्वा हैं और सबका भिन्न भिन्न कार्य है। आँखों से देखना, कानों से सुनना ,नाक से स्वास लेना ,स्पर्श के लिए त्वचा और जीभ से स्वाद लेना, परंतु क्या आपने कभी सोचा कि प्रकृति ने हमें दो आँखे , दो नथुने ,दो कान, स्पर्श के लिए ये पूरा शरीर दिया परन्तु जिह्वा केवल एक दी ।ऐसा क्यों ? क्योंकि प्रकृति चाहती है कि हम देखे, सुनें और ज्ञान अधिक अर्जित करें और बोले कम क्यूंकि अधिक वाचाल होना नाश को निमंत्रण देता है ।

 

  • सब सदा यही कहते आए हैं कि यदि आगे बढ़ना है तो अपनों का साथ देना ही चाहिए । परंतु साथ देने से पूर्व ये अवश्य पहचान लेना चाहिए कि अपने हैं कौन । क्या अपने वही होते हैं जिनके साथ हमारा रक्त संबंध होता है या अपने मित्र ? अपने वो होते जो हमें सत्कार्य के लिए प्रेरित कर हमें आगे बढ़ाएं, हमारा साथ दें । जिनका साथ देने से समाज का नाश ,धर्म की हानि  हो वह सीधे होकर भी सगे नहीं होते । इसलिए जब अपनों की परिभाषा का चुनाव करें  तो उन्हें अपना माने जो आपका साथ अच्छे के लिए देंगे ,उन्हें नहीं जो हमें अज्ञान के मार्ग पर ले जाएं ।

 

  • आप जिनसे प्रेम करते हैं सदा उनके समीप रहना चाहते हैं । नहीं चाहते की कभी अपनों से दूर होना पड़े । परंतु एक समय के पश्चात् अपनों से दूर हो जाना उन्नति के लिए आवश्यक है । आप माता पिता हैं, यदि आप अपनी संतान के जीवन के हर पग पर उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे तो आपकी संतान स्वयं मार्ग चुनना कैसे सीखेगी ? मार्ग के कांटों से स्वयं को बचाना कैसे सीखेगी ? इसीलिए एक समय के पश्चात् अपनों से बनायी गयी दूरी सदा लाभदायक रहती है ।

 

  • एक कथा सुनियें:  एक दिन प्रातः एक व्यापारी अपने घर से निकला । घर से निकलते ही एक बिल्ली ने उस व्यापारी का मार्ग काट दिया । व्यापारी घबरा गया । वह फिर से घर लौट गया और शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करने लगा । और जब वह पुनः अपने घर से निकला तब वो वाहन जा चुका था जिससे राजा तक पहुँच कर उसे भेंट देनी थी । राजा को भेंट नहीं मिली । राजा क्रोधित हो गए । राजा ने उस व्यापारी का व्यापार बंद करवा दिया । इस कारण व्यापारी क्रोधित होकर घर पर अपनी पत्नी से लड़ बैठा । पत्नी अपने बच्चों समेत मायके वापस चली गई और उस व्यापारी के जीवन में यदि कुछ रह गया था तो केवल अंधकार और इन सब का कारण वो उस बिल्ली को मानता रहा जिसने उसका मार्ग काटा था । ऐसा ही एक दूसरा व्यापारी राजा को भेंट देने निकला और उस व्यापारी का मार्ग भी एक बिल्ली ने काट दिया । वह व्यापारी तनिक घबराया परंतु उसने आगे बढ़ना अधिक उचित समझा । राजा तक समय पर पहुँच उसने राजा को भेंट दी। राजा प्रसन्न हुए और राजा ने व्यापारी को अपना व्यापार बढ़ाने की अनुमति दी और स्वर्ण आभूषण दिए । जब व्यापारी घर पर पहुंचा तो पत्नी को आभूषण और अपने बच्चों को देने के लिए वस्त्र थे उसके पास, हर ओर प्रसन्नता थी । कुछ समझे ? दोनों के साथ एक ही प्रकार की घटना हुई परंतु दोनों की प्रतिक्रिया भिन्न थी । ऐसा ही हमारा जीवन भी है हमारे जीवन में प्रारब्ध का अपना स्थान है परन्तु उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हमारी प्रतिक्रिया, हमारे सोच का प्रभाव है । चूंकि यही हमारे जीवन को आकार देते है इसलिए अपनी सोच को सकारात्मक रखें । आपका जीवन सदैव आनंदमय रहेगा ।

 

  • हम सभी अपने जीवन में कोई न कोई कार्य करते हैं । कार्य करते हैं तो थकान की अनुभूति होती है और यदि थकान ना उतरे तो कार्य करने का मन नहीं करता । हम आशा करते हैं कि कदाचित एक दिन में 24 के स्थान पर 26 घंटे होते तो आराम करने के लिए हमें और अधिक समय मिल जाता । हमें ऐसा अनुभव होता है कि हम बहुत अधिक कार्य कर रहे हैं। परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि जो लोग संसार में सफल हैं उनके पास भी सफल होने के लिए दिन में केवल चौबीस घंटे थे, तो फिर वे अधिक सफल क्यों ? इसका एक छोटा सा रहस्य है । वो वो कार्य चुनते हैं जो उन्हें प्रिय हैं, जिसे करने में उन्हें आनंद आता है । उन्हें लगता ही नहीं कि वो कार्य कर रहे हैं । उन्हें लगता है कि वो प्रति पल आनंद मना रहे हैं और जब आप आनंद मनाते हैं तो थकान कैसी? इसलिए यदि आप जीवन में कोई भी कार्य करें तो वो आपके मन को भाना चाहिए या जो कार्य आप कर रहे हैं आपका मन लगना चाहिए । सफलता आपको जरूर मिलेगी ।

 

  • कभी सोचा है हमारा जीवन भी रेत की घड़ी की भांति है । जो रेत नीचे गिर चुकी है वो हमारा अतीत । जो अब भी ऊपर है  वो हमारा आने वाला भविष्य और वर्तमान ये संकुचित स्थल है जहां से धीरे धीरे करके रेत गिर रही है, अर्थात हमारे पास जीने के लिए यही एक क्षण है उसका उपयोग कैसे करना है ये हम पर निर्भर करता है । जो बीत गया उसका दुख मनाना है । या जो भविष्य में होने वाला है उसकी प्रतीक्षा में क्रोध करना । सब कुछ करने के लिए यही एक क्षण है, प्रसन्न रहना है तो उसके लिए भी यही एक पल है । प्रतीक्षा करते रहोगे तो ये पल भी भूतकाल में बदल जाएगा । इसलिए आनंद के परोपकार के लिए प्रतीक्षा न कीजिए । आपके पास जो पल है उनका भरपूर सदुपयोग कीजिए ।

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